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Friday, 28 August 2015

भाई से सन्देश ये कहना



अम्बर के चंदा जरा सुनना
भाई से सन्देश ये कहना
जब से गये हैं हमसे बिछड़कर
एक नजर ना देखी पलभर
उन सा कोई और कही ना....
भाई से सन्देश ये कहना
आखों से हर ख्वाब है टूटा
आश भरी हर सांस है छूटा
उनके बिना सारा घर सूना....
भाई से सन्देश ये कहना
इतने दूर गए हैं वो तो
कैसे भेजूं राखी उनको
कोई पता ना कोई ठिकाना .....
भाई से संदेश ये कहना
अम्बर के चंदा जरा सुनना.    

Thursday, 20 August 2015

तुलसी के मानस में राम



ह्रदय के सुन्दरतम भूमि में
जिनके बुद्धि हुये महान
मेघ रूप वो साधु बनकर
बरसाये मंगल घट गान.
सुन्दर शीतल सुखदाई सम
मानसरोवर के वो नाम
मंगलकारी तुलसी जी के
मानस में रहते हैं राम.
जनहित के हर सूत्र पिरोकर
युग प्रश्नों का कर समाधान.
भक्ति साधना की अनुभूति से
निहाल होते हैं विवेकवान.
बहुरंगे कमलों का दल हो
वैसे दोहा छंद की पंक्ति
सुन्दर भाव अनुपम सी भाषा
जैसे पराग सुगंध की शक्ति.
बंधकर भी निर्बंध रहे जो
मोहपाश में कभी ना आये 
कष्ट सहिष्णु परम भक्त वो
खल गण के भी उर में समाये.
निर्मल मन ही वह माली है
जिस पर ज्ञान का लगता फूल
भगवत्प्रेम के जल से सींचकर
कुटिल मन होते अनुकूल.
राम चरित को रचने वाले
उन चरणों में नमन अनेकों 
मानस के सातों सीढी से
जीवन सार दिये हैं सबको.     
  
               

Friday, 14 August 2015

देश हमारा हिंदुस्तान



संघर्षों के कठिन सफर में
यातनाओं के पीड़ित प्रहार में
अश्क भरी आखों में सपने
था संजोया सेनानी अपने
रुंधे गले से गाया था गान
देश पे होना है कुर्बान.
सालों पहले हुये स्वाधीन
दशा-दिशा अब भी गमगीन
मस्तिष्क भ्रमित है विचारहीन
संघर्ष-रत है दीन हीन
विपदाओं से होकर परेशान
आहुति प्राण का दे रहे किसान.
लोभ-लालच की राहें चुनकर
आत्मघाती बन रहा निरंतर
अंतर में निष्ठुरता भरकर
जान गंवाता जानें लेकर
क्या उनका था यही अरमान
जो देश पर हो चुके बलिदान.
पवित्र-तीर्थ भूमि के समान
देश है अपना हिंदुस्तान
संस्कृति है इसकी पहचान
गीता गंगा गौ महान
आन है इसके कर्मठ किसान
शान पर इसके मिटते हैं जवान.       
          

Friday, 7 August 2015

भारत है गांवों का देश



भारत है गावों का देश
हरियाली है इसकी वेश
रीति-रस्म-रिवाज विशेष
उपेक्षित कुंठित नेत्र निमेष.
बुराइयाँ हो लाखों हजार
वो होते हों भले गंवार
उर में उनके बसते है प्यार
निश्छल प्रेम करते व्यवहार.
कभी होते सूखे से बेहाल
कभी बाढ़ों से होते बदहाल
धन से भी होते तंगहाल
फिर भी जीते हैं हर हाल.
सम्पूर्ण जगत का प्राण आधार
वहां पर फसलें होती तैयार
जहाँ ना होती कोई सुधार 
जहाँ गरीबी है बेशुमार.
रफ़्तार की उस दौड़ से अनभिज्ञ है
जिस शोर से आहत हुआ मर्मज्ञ है
जन  हितैषी और विवेकी विज्ञ है
मिष्टभाषी पारदर्शी सर्वज्ञ है.
समस्या का हो निराकरण
सुन्दर सुविधा हो परिपूरण
सरल सुलभ हो आवागमन
क्यों करे फिर कोई पलायन.
गाँव बदले तो बदलेगा देश
साक्षरता में संभलेगा देश
विकासशील कहलायेगा देश
अतुल रम्य बन जायेगा देश.