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Friday, 29 May 2015

हे श्रेष्ठ युग सम्राट सृजन के



हे श्रेष्ठ युग सम्राट सृजन के
नमन अनेकों विराट कलम के
लेखों के सुन्दर मधुवन में
सीखों के अनुपम उपवन में
मधुर विवेचन संचित बन के
नमन अनेकों विरत कलम के.
लोभ-दंभ की जहाँ है काई
ह्रदय में सबकी घृणा समाई
लिखे हजारों ग्रन्थ शुभम के
नमन अनेकों विराट कलम के .
तुलसी-सूर चाणक्य की महता
जिसने लिखा मन की मानवता
सत्य ही शिव है गहन लेखन के
नमन अनेकों विराट कलम के .
संवेदन बन जाये जो जन-जन
महके मुस्काए वो क्षण-क्षण
तंतु बिखर जाते बंधन के
नमन अनेकों विराट कलम के .
जाने कितने छंद सृजन के
कह देती है द्वन्द कथन के
नैन छलक पड़ते चिन्तन के
           नमन अनेकों विराट कलम के .         

Friday, 15 May 2015

नन्हा बीज संकल्पित होकर



नन्हा बीज संकल्पित होकर
आता है जब वो धरती पर
करने को सपने साकार
देने को सुदृढ़ आकार
सृष्टि को सुन्दर बनाने
सांसों में सुवास को भरने
जन-जन का मन पुलकित करने
अरमानों को सज्जित करने
वायुदेव का प्रचंड आवेग
सहता अनेक उन्माद का वेग
विनम्र हो झुकता रहा  
तृष्णाओं को पीता रहा  
बाधाओं से लड़ता रहा  
संकल्प ले बढ़ता रहा
त्याग-तप का लेकर सीख
बन गया विशाल सा वृक्ष
झुलसे तन को छाया देकर
पर-तृप्ति प्राणों में भरकर
राहगीरों के राह का डेरा
बन गया पंछियों का बसेरा
औरों की सेवा करने का
प्रण लिया मरने-मिटने का
सार्थक बनाया अपना जीवन
परोपकार ही उसका दर्पण .