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Friday, 18 December 2015

लेखनी हर-पल कुछ कहती



कागज पर जो छपते अक्षर
काले रंग ही होते अक्सर
अभिव्यक्ति बेहतर बन जाती
सदचिंतन उर में भर देती
श्याम रंग से लिखी इबादत
अंतस की बन जाती चाहत
लिखने वाले का चित भले हो काला
शुभ्र पंक्तियाँ भरते मन में उजाला
विचार भाव का ताना-बाना
कह देते मन की कसक वेदना
भाषायें शब्दों से बनती
शब्द हो चाहे उर्दू-हिंदी
प्रत्येक शब्द का होता मूल्य
जो दर्शाता सामर्थ्य अमूल्य
अर्थ-ध्वनि का होता समावेश
निर्मित करता पात्र व परिवेश
भावनाओं में भीगा स्वरुप
अपनत्व भरे बहुतेरे रूप
रोम-रोम आनंदित करते
मंद समीर बन मन को छूते  
कभी संवेदना में डूब जाते स्वर
कभी वेदना बन जाती प्रखर
कहीं फूलों सी खुशबु बन जाती
कही प्रेरणा बनकर मुस्काती
कागज के उजले पन्नों पर
अनमोल बन जाती है बिखर कर
लेखनी हरपल कुछ कह जाती
भावनाओं के संग में बह जाती.