Friday, 27 November 2015

विश्व में बस एक है



जड़ता-कटुता-हिंसा ने
सभ्यता को पंक बना दिया
मिट्टी के पुतले बनकर
मानवता को मुरझा दिया.
विद्वेष घृणा से लड़नेवाले
अनुरागहीन अनासक्त हुआ
भूलोक का गौरव मनोहर
देख कर भी न आसक्त हुआ.
मधुरता का बोध ही
जाने कहाँ पर खो गया
ऐसा प्रतीत होता है
जन यांत्रिक सा हो गया.
मानव ही मानव का
बन रहा व्यवधान
तोड़ पाये जो प्रथा को
है वही विद्वान.
छूट कर पीछे गया है
भावनाओं का देश
अब सिर्फ केवल बचा है
कोलाहल और क्लेश.
आसूओं में दर्द की
बह रही तश्वीर
इस देश की हे विधाता
कैसी है तक़दीर.
निर्दयता के पावस घन पर
बार-बार कम्पित होता मन
क्रूर वक्त की मलीन पृष्ठ पर
भर आएगा सहज ये नयन.
सबने देखा देशप्रेमियो का
उत्सर्ग किया अरमान अलौकिक
अंध क्रोध में भरकर सबने
लौटाया सम्मान चतुर्दिक.
असीम अखंड आत्मभाव
जिस देश में अनंत है
वही ऋषि भूमि अपना
विश्व में बस एक है.   
         

       

Friday, 20 November 2015

गांधारी की आँखों के तेज



राज घराने की वो दुलारी
थी सुन्दर सी राजकुमारी
रूपसी वो अथाह हुई थी
लेकिन अंधे से ब्याह हुई थी
अपने पति की ये लाचारी
भांप चुकी थी वो बेचारी
पति को देवता मान चुकी थी
उनका दुःख अपना चुकी थी
कहीं ये मन भटक ना जाये
उनसे कोई भूल न हो जाये
आखों पर पट्टी बांधी थी
गम उनको ना छू पायी थी
श्रेष्ठ हुए थे उनके विचार
अंधी बनना की थी स्वीकार
इस जग की मोहक छवि प्यारी
नहीं देखी कोई दृश्य मनोहारी
अहं भाव निज त्याग ना पाते
खुद सर्वस्व लुटा नहीं पाते
छिपा शेष कामना अंतर में
अनजान सी थी सायं-प्रातर में
घन-तम की चुनरी ओढ़ी थी
मायावी दुनिया से छिपी थी
धन्य हुआ था उनका जीवन
उपलब्धि थी उनका समर्पण
बंद आखों से की आराधना
सार्थक बनी उनकी प्रार्थना
तप की साधना बनी मिशाल
नेत्र की ज्योति बनी विकराल
इतनी तेज भरी नयनों में
भष्म हो जाये लोग क्षणों में
सामने आया था सुयोधन
वज्र समान बना उसका तन
विधि की लीला रची हुई थी
दुर्योधन को मौत मिली थी
गांधारी की आखों के तेज
कभी नहीं हुआ निस्तेज.     
        

Sunday, 15 November 2015

छठ पर्व की उपासना



शुक्ल पक्ष की तिथि षष्ठी
कार्तिक का पवित्र महिना
साधना करते साधक गण
सविता की करके उपासना.
रोग-मुक्त हो पुत्र प्राप्त हो
दीर्घायु की अटल कामना
छठ की पूजा मन से करते
रखते अनंत भक्ति की भावना.
सूरज से वर्षा होती है
वर्षा से अन्न की उत्पन्न
अनगिनत प्राणियों का फिर  
पृथ्वी पर होता पोषण.
बांस के सूप मिट्टी के बर्तन
चावल गुड़ से बना प्रसाद
सुमधुर गीतों की ध्वनि से
छठ पूजा की मीठी सुवास.
रीति रिवाज के उन रंगों में
उपासना का है अपना ढंग
न विशेष धन की जरुरत
न पुरोहित शास्त्र का संग.
अर्ध्य दान और भावदान की
है इसकी कुछ खास महत्व  
अपने अपने सामर्थ्यों से
पूजा करते श्रद्धा-वत.
कामनापूर्ति छठ की पूजा
जो करते हैं सदा निरंतर
मनवांछित फल सहज ही पाते
सूर्य षष्ठी के शुभ अवसर पर.