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Friday, 28 November 2014

प्रभु की लाठी



बस गंतव्य को चल पड़ी थी
भीड़ बड़ी उमड़ी हुई थी
एक बाबा थे बस में सवार
व्यक्तित्व था उनका रौबदार
एक सज्जन जो चुप बैठा था
बाबा के पहलु से सटा था
वो अचानक चीख उठा था
मै लुट गया कहकर रो पड़ा था
जेब मेरे कट गए हैं
सारे पैसे लुट  गए हैं
मेरी मेहनतभरी कमाई
बचा न अब तो एक भी पाई
कंडक्टर ने बस को रोकी
होने लगी तलाशी सबकी
बाबा के भी पास थे पैसे
क्षोभ से गर्दन थे झुके से
सिपाही ने बाबा को डांटा
लगा भी दी एक-दो चांटा
ना ही किया उम्र का लिहाज
न रखी उनकी कुछ लाज
बाबा की आँखें भर आई
इस उम्र में हुई जग हंसाई
सारे दिन की कठिन कमाई
कुछ भी मेरे काम न आई
बच्चों ने घर से निकाला
भाग्य ने इज्जत उछाला
इस दुनियां से रुखसत कर
या अल्ला इंसाफ कर
जो सज्जन पैसा ले भागा
तांगे से टकराया अभागा
घोड़े सीने पर चढ़ आया
खून से लथ-पथ हो गयी काया
उसने कहा बाबा को बुलाओ
प्लीज जरा बाबा को लाओ
हाथ जोड़कर उसने बोला
माफ़ करें मै झूठ था बोला
आपके पैसे यहीं पड़े  हैं 
खुदा ने मुझको सजा दिये हैं
मौन खड़े बाबाजी रोये
जी भरकर आंसू बरसाये
भगवान सबके साथ न होते
कमजोर बेचारे रोज ही पिटते
प्रभु की लाठी सख्त बड़ी है                  
न जाने कब किस वक्त पड़ी है.


  


Thursday, 20 November 2014

ऐसा पूत युगों में आता


ऐसा पूत युगों में आता
जिस पर गर्व हमें  हो पाता
अपनी मूल्य पहचान बनाता
दुनिया में सम्मान बढ़ाता
आत्मबोध से जोड़े खुद को
बन विन्रम समझाये सबको
कार्य करे सब न करे समीक्षा
श्रम है शक्ति श्रम है परीक्षा
मात्र समर्पण से ना होगा
तन-मन से यूँ जूड़ना होगा
तभी होगा विस्तार मिशन का
दुनिया भर के जन जीवन का
ऊँची सोच जिसके होते हैं
शत-शत जीवन वो जीते हैं
वही उठेगा जिसने सारा
दीन दुखी का करुणा पीड़ा
अपना बनाकर हर्षाया है
वही लोक यश भी पाया है .       

Saturday, 15 November 2014

काल के जाल


  काल के नेत्र लाल-लाल
ओष्ठ काले भयभीत कपाल
स्मित भयंकर वेश विकराल
मंथर गति  और क्रुर सी चाल
काल का प्रचंड वेग
है दुखद आवेग एक
अनगिनत आरम्भ अंत
राजा रंक और संत
साम्राज्य-राज्य का गठन
काल ने किया दमन
उदय और अवसान का
दिवस के गणमान का
ख्यातियां-उपलब्धियां
समस्त कामयाबियां
व्यक्तित्व-अभिव्यक्तियाँ
प्रचंड-कूटनीतियाँ
सौन्दर्य और सृष्टियाँ
रौंदकर-शक्तियाँ
काल बस उजाड़ता
तोड़ता-मरोड़ता
कर्ण महादानी सा
विदुर महाज्ञानी सा
अनगिनत महारथी
शूरवीर-सारथि
सबको-रौंदता हुआ
अठखेलियाँ करता हुआ
आगोश में खींचता है वो
पीड़ा से तड़पाता वो
वेदना से झुलसाता वो
क्रूरता दिखलाता वो
मृत्यु जाल फेककर
गाल में समाकर
कर देता अस्तित्व हीन.
                  

Monday, 10 November 2014

नारी बिना साहित्य अधूरा



नारी कविता की पंक्ति है
चिंतन-मनन की अभिव्यक्ति है
उससे प्रेरित ये सृष्टि है
हर देवी की वो शक्ति है
संवेदना की वो मूर्ति है
भावना में वो बहती है
संस्कृति को सिंचित करती है
दर्दभरी पंक्ति लिखती है
समाज की दुखभरी विवशता
कई विषय को उसने समझा
हुई प्रतारित खुद को झोंका
हर विरोध को उसने रोका
घूंट अनेकों पीकर कड़वा
देती रही हर-पल परीक्षा
मूक समर्पण की थी भाषा
घूटनभरी थी ज्ञान पिपासा
मूर्छित शोषित थी अभिलाषा
ख्वाब भरी थी नन्ही आशा
वैदिक युग की जो थी नारी
अपने चितन से युग को संवारी
लेखनी में करके भागीदारी
साहित्य में अपनी पैर पसारी
काव्य फलक की थी ध्रुवतारा
नाम था उनका बाई मीरा
काव्य सृजन की बहती धारा
प्रखर प्रेरणा की अवतारा
अनगिनत है ऐसी विदुषी
साहित्य में उभरी है मनीषी
एक से बढ़कर एक विभूति
जिसने भरी सुन्दर अनुभूति
सौन्दर्य अभिलाषी कालिदास
तुलसी जायसी और प्रसाद
सबने माना नारी को खास
नारी है गरिमा की सुबास
कल्पना में भरकर उड़ान
नये रूप में लेकर पहचान
साहित्य के नभ में छाई है
अपनी ध्वजा लहराई है
शिक्षा का आलोक जो बिखरा
ज्ञानभरी राहों से गुजरा
रौशन हुआ उर का अँधेरा
                    नारी बिना साहित्य अधूरा.