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Friday, 27 June 2014

बुढ़ापा है जीवन की शान



सफ़ेद बालों से होती पहचान
बुढ़ापा है जीवन की शान
सूर्योदय की पहली लाली
बचपन की मौजे मतवाली
दोपहर की प्रखर सी किरणें
उमंग-तरंग जो तपती मन में
डूबते सूर्य की गोधुली शाम
मनुष्य जीवन की है विश्राम
उम्र की हर पराव चढ़कर
बुढ़ापा आती है समय पर
लेकर सुन्दर सोच महान
सुभग सृजन करके अविराम
देकर अपनी क्षमता प्राण
गरिमामय चिंतन अभियान
लोक पथ हितकारी काम
करते रहे निज देकर ज्ञान
अनुभवों की धार से
अज्ञान-तम को प्यार से
प्रेरणा में रंग भरकर
परिवार में आदर्श बनकर
परंपरा के साथ चलकर
मार्गदर्शन कर के निरंतर
होकर सदा स्फूर्तिवान 
जीते हैं जो उम्रे तमाम
वो बुढ़ापा है महान
          कहलाते जीवन की शान .      

Friday, 20 June 2014

गतिशीलता ही जीवन है



धरती घूमती रहती हर-पल
सूरज-चन्द्र ना रुकते इक पल
हल-चल में ही जड़ और चेतन
उद्देश्यपूर्ण ही उनका लक्षण
सदैव कार्यरत धरा-गगन है
गतिशीलता ही जीवन है
गति विकास है गति लक्ष्य है
गति प्रवाह है गति तथ्य है
धक-धक जो करता है धड़कन
मन-शरीर में होता कम्पन
दौड़ते जाते हर-दम आगे
एक-दूजे को देख कर भागे
लक्ष्य भूलकर सदा भटकते
उचित-अनुचित का भेद ना करते
पूर्णता की प्यास में आकुल
तन और मन रहता है व्याकुल
संबंधों का ताना-बाना
बुनता रहता है अनजाना
एक ही सत्य जो सदा अटल है
हर रिश्ते नातों में प्रबल है
जहाँ मृत्यु है वही विराम है
फिर ना कुछ भी प्रवाहमान है
पूर्ण अनंत ही ईश समर्पण
जैसे विलीन हो जल में जल-कण.  
  
    

Friday, 13 June 2014

पितृ - दिवस




खुदा ने मुझको सजा ये दी है
पिता-दिवस में पिता नहीं है
हमारी उर की व्यथा यही है
कहाँ पर होंगे पता नहीं है
बरगद की छाया सी स्नेह
सदा बरसता उनका नेह
उनकी करुणा जब बहती थी
ये दुनिया सुन्दर दिखती थी
उनके बिना सूना घर सारा
हर कोने में उन्हें पुकारा
विधि ने ऐसी नियम बनाई
झेलनी पड़ती विषम जुदाई 
अपने हो जाते है पराये
 ढूंढते रहते उनके साये
पीड़ित भावना थकित चेतना
किससे कहूँ मै व्यथित वेदना
सब कुछ है अपने जीवन में
फिर भी कमी सी रहती मन में
अपनों से न कोई जुदा हो
चाहे कितनी बड़ी खता हो
जहाँ कहीं  हो उनके चरण
        हम करते हैं उन्हें नमन .