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Friday, 28 March 2014

सौन्दर्य



सौन्दर्य अभिलाषी कौन नहीं है
चाह सुन्दर की किसे नहीं है
सुन्दरता की भाषा क्या है
दृष्टि की अभिलाषा क्या है
काया की वो सुन्दरता है
या अंगों की मादकता है
भावनाओं की दुर्बलता है
या चंद्र-अंशु की शीतलता है
सौन्दर्य कला है या व्यवहार
या उपेक्षित गुणों की धार
दिव्य विचारों में निहित है
या कवियों के शब्द सीमित है
मनोविकार का भ्रमित मार्ग है
या नजरों की दूषित राग है
सौन्दर्य दर्शन का है अभिरूप
या मन इंद्रियों के वशीभूत
सौन्दर्य प्रकृति का है उपहार
या तन-मन में मीठी सी फुहार
शिव का पावन बोध सौन्दर्य
या रचयिता की भोग सौन्दर्य
अपनों का सहयोग सौन्दर्य
या प्रकृति का सौभाग्य सौन्दर्य
कण-कण  में सौन्दर्य भरा है
रत्न विभूषित अपनी धरा है .

Saturday, 22 March 2014

विचार क्रांति



आज की पीड़ा आज की भ्रान्ति
किस तरह से होगी क्रांति
व्यक्ति-व्यक्ति परिवार का मिलकर
सोच-चिंतन में जोश को भरकर
दिल से दिल की आग लगा दे
क्रांतिकारी अलख जगा दे
गन्दी बस्ती गाँव का जर्जर
किस  तरह से जीते मर्मर
लोगों की हालत है बदतर
कौन बनेगा उनका सहचर
 वोट-वोटर और संकल्प
ढह गए सारे विकल्प
दागी नेता और परिवार
देश में भर देंगे विकार
अनीति अधर्म और अनाचार
सघन ही होगा भ्रष्टाचार
भक्त प्रह्लाद को था इनकार
निरंकुश शासन का अत्याचार
अपने युग के पथ प्रदर्शक
आदर्श बने है विवेका अबतक
महाभारत का समर सजाकर
लक्ष्य वादे को परे हटाकर
व्यर्थ कार्य में समय लगाकर
नेता जूझते रहते अक्सर
जनसमूह को सोचना होगा
विराट रूप दिखाना होगा
बम पिस्तौल अब नहीं चलेगी
                                                                      अब विचार से क्रांति होगी

Thursday, 13 March 2014

होली के रंग



शीतल सुगंध  पवन बहे मंद
सृष्टि बौरायी है होकर उमंग
निकला लगाने को फागुन अलबेला
उषा के माथे पर रोली का रेला
उड़ती है नभ में रंग ये सारा
कितना है सुन्दर जग का नजारा
चारों ओर शोर है मस्ती का दौर है
शिकवा-शिकायत का कहीं नहीं ठौर है
विकृत उपासना वासना की भावना
जल उठी होलिका में व्यर्थ सभी कामना
हास न उपहास हो उत्सव ये खास हो
रक्त नहीं रंग की स्नेहिल सुवास हो
ह्रदय की भूमि पर मधुर सा साम्य हो
प्रेम की पुकार पर इठलाता भाग्य हो
सुन्दर मन-मीत हो प्रेम के गीत हो
होली के रंग में सच्ची सी प्रीत हो
हंसने हँसाने का होली है नाम
जब-तक है जीवन जी लें तमाम.

HAPPY HOLI

Thursday, 6 March 2014

गिरधर की मीरा –महादेवी




 


वो प्रतिमा थी तपस्वनी
श्वेत –वस्त्रा अंग धारिणी
सरस्वती सी रूप था शोभित
थी साहित्य की शिखर वासिनी.
व्यथा भरी थी काव्य की पंक्ति
करुणा की अनमोल विभूति
‘’नीर भरी दुःख की बदली’’ सी
सद –विचार की थी अभिव्यक्ति.
जग पीड़ा से विकल बड़ी थी
कुछ करने को निकल पड़ी थी
गिरधर की वो मीरा बनकर
पवित्र ज्योति से प्रखर हुई थी .
दुःख -पीड़ा  विपदा संघर्ष
ईश्वर की है माया अंश 
''प्रलय के घन करते उत्पात ''
शांत मन में देकर दंश.
मर्यादा जब लगे भूलने
लाज –वसन जब लगे टूटने
तभी विनाश की होती आहट
शील नारी का लगे उघड़ने.
आदर्श पथ पर चले अगर
भ्रष्ट अधर्म को तजे अगर
तो निश्चय जग होगा सुन्दर
मिल पायेगा मनचाहा डगर .
महादेवी का था अरमान
हो सबका यही आह्वान
घर –घर की अभिमान हो बेटी
नर-नारी हो एक समान .