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Friday, 18 July 2014

गृहस्थ जीवन है तपोवन


महर्षियों का श्रेष्ठ वचन

गृहस्थ जीवन है तपोवन


भारतीय संस्कृति की शान


रिश्ते नातों का सम्मान


शादी होती बनता परिवार


जिम्मेदारियों का बड़ा पहाड़


एक दूजे का सम व्यवहार


कुशल आदतें गुण संस्कार


चिंता चिंतन और सहयोग


सांसारिक सुख का उपयोग


जहाँ छीनता सुख अधिकार


वो कहाँ होता है परिवार


नारी संवेदना का है रूप


स्नेह भावना का प्रतिरूप


वो चाहे तो घर हो सुन्दर


वो चाहे तो घर हो जर्जर


विधि ने गुण देकर कुछ खास


बसा दिया नारी में सुवास


कल्पना में रंग भरकर


अरमानों को संग लेकर


हरपल आगे बढती जाती


जीवन पथ को सुखद बनाती


सेवा संयम धैर्य अपनाती


गृहस्थ जीवन सफल बनाती


अपनापन कभी न छोड़ती


स्वाभिमान से मुँह न मोड़ती


इक-दूजे में स्नेह जगाती 


प्यार-विश्वास-आश से जीती


राजा जनक का सुन्दर गेह


कहलाते थे वे विदेह


गृहस्थ जीवन में ही रहकर


काम किये योगी सा बनकर


जप-तप-पूजा साधना ध्यान


मन के अन्दर ही है ज्ञान


क्यों भटके जंगल और धाम


उर में बसते है भगवान


सुन्दर घर संसार जो होता


नर नारी दोनों से बनता


थोड़ा संयम रखना होता  


थोड़ा थोड़ा तपना होता  


सुखमय होगा सबका संसार  

क्यों बिखरेगा कोई परिवार