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Friday, 11 July 2014

नेत्रहीनता उनकी व्यथा थी



धृतराष्ट्र जो जन्मांध हुए थे
अत्यधिक ही मोहान्ध हुए थे
वो सदा दुखित हुए थे
पुत्र मोह से व्यथित हुए थे
आत्महीनता से ग्रसित थे
महत्वाकांक्षा से पीड़ित थे
जीवन चेतना लुप्त हुयी थी
व्यक्तित्व उनकी सुप्त पड़ी थी
नेत्रहीनता उनकी व्यथा थी
उसी व्यथा से कथा बनी थी
अति मोह आकांक्षा की डोर
मन के अन्दर था पुरजोर
महात्मा विदुर महर्षि व्यास
बुझा सके न उनकी प्यास
आसान नहीं उनको समझाना
सत्य-तत्व का बोध कराना
बड़ा कठिन था कुछ भी बताना
सही प्रतीक उपमा को देना
प्रकृति जो इतनी सुन्दर है
अंधे जन को कहाँ खबर है
महा कपटी शकुनि का खेल
उनको बनाया विष का बेल
कलुष कषाय और कालिमा
कभी नहीं देते सुखद लालिमा
पुत्र हठ को छोड़ ना पाये
सत्य को स्वीकार ना पाये
भोग विलास ऐश्वर्य को चाहा
जिसके लिए अधर्म निवाहा
पतिपरायणा थी गांधारी
धर्मपरायणा थी बेचारी
दो डोरो पर उलझ रही थी
दुर्योधन ही कमजोर कड़ी थी
मन की आँख से देख न पाई
जीवन अपना समझ न पाई
प्राप्तव्य यहीं है यहीं गंतव्य
यहीं है जीवन के कर्तव्य
सौ पुत्रों के पिता बने थे
अहंकार की चिता बने थे
संस्कार को दुषित बनाया
अंधेपन का लाभ उठाया
हठी पुत्रों ने युद्ध कराई
व्यर्थ ही अपनी जान गंवाई
पिता ने अपना सब कुछ हारा
अपने ही हाथों वंश उजाड़ा
एक ही पुत्र से रोशन जग हो
जैसे चाँद से शोभित नभ हो
संस्कारमय सद जीवन हो
दुषित कभी ना अपना मन हो .