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Friday, 6 June 2014

गंगा-गीत

सुनो हे माँ मेरे उर की तान
क्यों मुँह फेरी गैर नहीं हूँ ,
                 तेरी हूँ संतान,सुनो हे.....             
दुखिता बनकर जीती आई
पतिता बनकर शरण में आई
मुझ पर कर एहसान,सुनो हे......
मोक्ष-दायिनी , पाप-नाशिनी
कहलाती , संताप-हारिणी
प्रेम का दे दो दान,सुनो हे......
शांति-सद्गति सब-कुछ देती
मैंने भी की तेरी भक्ति
करके हरपल ध्यान,सुनो हे.......
पुण्यमयी तेरी जल-धारा
तूने सगर पुत्रों को तारा   
तेरी महिमा महान,सुनो हे.......
प्रातः सुमिरन जो भी करते
सब पापों से मुक्ति पाते
तू शिव की वरदान,सुनो हे.......