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Thursday, 6 March 2014

गिरधर की मीरा –महादेवी




 


वो प्रतिमा थी तपस्वनी
श्वेत –वस्त्रा अंग धारिणी
सरस्वती सी रूप था शोभित
थी साहित्य की शिखर वासिनी.
व्यथा भरी थी काव्य की पंक्ति
करुणा की अनमोल विभूति
‘’नीर भरी दुःख की बदली’’ सी
सद –विचार की थी अभिव्यक्ति.
जग पीड़ा से विकल बड़ी थी
कुछ करने को निकल पड़ी थी
गिरधर की वो मीरा बनकर
पवित्र ज्योति से प्रखर हुई थी .
दुःख -पीड़ा  विपदा संघर्ष
ईश्वर की है माया अंश 
''प्रलय के घन करते उत्पात ''
शांत मन में देकर दंश.
मर्यादा जब लगे भूलने
लाज –वसन जब लगे टूटने
तभी विनाश की होती आहट
शील नारी का लगे उघड़ने.
आदर्श पथ पर चले अगर
भ्रष्ट अधर्म को तजे अगर
तो निश्चय जग होगा सुन्दर
मिल पायेगा मनचाहा डगर .
महादेवी का था अरमान
हो सबका यही आह्वान
घर –घर की अभिमान हो बेटी
नर-नारी हो एक समान .