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Saturday, 30 November 2013

बालिग बनकर कब सोचेंगे



                  

तन से बालिग बन बैठे है
मन से अब तक ही छोटे है
बढ़ चढ़ कर अपराध किये है
धर्म के धंधे साथ लिए है
त्याग- तपस्या कुछ नहीं भाता
बनते स्वार्थी पीड़ा दाता
जाट –पांत का भेद बढ़ाते
पाप –पतन की राह पर चलते
ढृढ –संकल्प हुए अधूरे
वेद मंत्र पड़े है बिखरे
ईमान-आदत –चरित्र सिद्धान्त
ये सब है कहने की बात
नैतिकता कहाँ से लाये
हो चुका जो कबसे पराये
हिंसा- हत्या चोरी –लूट
दुर्बल मन की है करतूत
इंसानियत अपनाना होगा
प्रयास सबों को करना होगा
कुत्सित विचार को छोड़ना होगा
बालिग बनकर सोचना होगा