Saturday, 31 August 2013

प्रेम दर्शन




             

संस्कृति हो या दर्शन
साहित्य हो या कला
प्रेम की गूढता अनंत है
ये समझे कोई विरला.
ये चिंतन में रहता है
ये दृष्टि में बसता है
जीवन का सौन्दर्य है ये
अनुभव में ही रमता है.
ये घनिष्ठ है ये प्रगाढ़ है
ये है इक अभिलाषा
विश्वास स्नेह का भाव है
ये है केवल आशा.
ये रिश्ता है ये मित्रता है
ये है विवेक की भाषा
शरीर आत्मा सब में समाहित
ये चाहत की परिभाषा.
निर्वाध रूप से ये निछावर
ये कोमल है बंधन
कर्तब्य उत्सर्ग दायित्व से मिलकर
ये करता संरक्षण.
ढाई -अक्षर प्रेम की गुत्थी
है अपनों का माध्यम
कवच बनेगा हर जीवन का
प्रेम है ऐसा पावन. 

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